विश्व कविता दिवस पर त्रिभाषा काव्य-गोष्ठी, बीकानेर में गूँजी हिन्दी, उर्दू और राजस्थानी की त्रिवेणी
विश्व कविता दिवस पर त्रिभाषा काव्य-गोष्ठी, बीकानेर में गूँजी हिन्दी, उर्दू और राजस्थानी की त्रिवेणी


बीकानेर, 22 मार्च 2026 (रविवार)। ‘विश्व कविता दिवस’ के उपलक्ष्य में प्रज्ञालय संस्थान द्वारा नत्थूसर गेट के बाहर स्थित ‘लक्ष्मीनारायण रंगा सृजन-सदन’ में एक अनूठा साहित्यिक नवाचार किया गया। इस अवसर पर आयोजित त्रिभाषा काव्य-गोष्ठी में हिन्दी, उर्दू और राजस्थानी के रचनाकारों ने अपनी लेखनी से कविता के वैश्विक महत्व और मानवीय संवेदनाओं को रेखांकित किया।


कविता का इतिहास मानव सभ्यता जितना पुराना: कमल रंगा
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए राजस्थानी के वरिष्ठ साहित्यकार कमल रंगा ने कहा कि कविता का अस्तित्व मानव सभ्यता के साथ ही विकसित हुआ है। मौखिक परंपराओं और वेदों के मंत्रों से शुरू होकर आज समकालीन दौर तक कविता ने अपनी भावनाओं और सांस्कृतिक इतिहास को जीवंत रखा है। उन्होंने अपनी कविता “बगत बेबगत/आपरै ही मतै/आयन ढूकी कविता…” के माध्यम से रचना प्रक्रिया के मर्म को समझाया।


साहित्यिक नवाचार और गंगा-जमुनी तहजीब
मुख्य अतिथि वरिष्ठ शायर जाकिर अदीब ने इस आयोजन को बीकानेर की काव्य परंपरा में एक अनुपम उदाहरण बताया। उन्होंने अपनी ताजा गज़ल “कोई हमें बताए/जिनको डराती है शायरी” पेश कर उर्दू की मिठास घोली। गोष्ठी में कवयित्री इन्द्रा व्यास ने राजस्थानी की सहजता के साथ मन की गांठें खोलने वाली पंक्तियाँ पढ़ीं, तो डॉ. कृष्णा आचार्य ने “मैं कविता कल-कल करती/झरणों संग बह आती हूं” के जरिए प्रकृति और शब्दों का मेल प्रस्तुत किया।
विविध रचनाकारों ने बिखेरे शब्द-रंग
काव्य गोष्ठी में कई वरिष्ठ एवं युवा कवियों ने अपनी प्रभावी प्रस्तुतियां दीं।
जुगल किशोर पुरोहित: “कविता को केवल/कविता मत समझो…” के माध्यम से कविता के गहरे संदर्भ खोले।
कैलाश टाक: “मेरी कविता मुस्कुराती है/दूर-दूर तक जाती है…” से कविता की सार्थकता बताई।
डॉ. गौरी शंकर प्रजापत: “अबै थूं फगत/कागज पर नीं रैवै…” के जरिए कविता के आधुनिक अर्थ स्पष्ट किए।
विप्लव व्यास: अपनी राजस्थानी मठोठ और “किण रा विचार केड़ा” जैसी पंक्तियों से प्रभावित किया।
नरसिंह बिन्नाणी: “शब्द कविता है/बहुत गंभीर…” के माध्यम से शब्दों की शक्ति को रखा।
इसी क्रम में गिरिराज पारीक, हनुमंत गौड़ और लीलाधर सोनी ने भी अपनी नवीन रचनाओं से गोष्ठी को परवान चढ़ाया।
साहित्यिक साक्षी और स्वागत
इस गरिमामय अवसर पर मदन जैरी, पुनीत कुमार रंगा, राहुल आचार्य और अख्तर अली सहित कई गणमान्य जन उपस्थित रहे। कार्यक्रम का प्रारंभ शिक्षाविद् राजेश रंगा के स्वागत उद्बोधन से हुआ। मंच संचालन गिरिराज पारीक ने किया और अंत में कवि हरिकिशन व्यास ने सभी का आभार व्यक्त किया।
