संसद में भाजपा सरकार की पहली बड़ी पराजय, महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन बिल लोकसभा में गिरा

संसद में भाजपा सरकार की पहली बड़ी पराजय
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नई दिल्ली,17 अप्रैल। भारतीय संसदीय इतिहास में आज एक अप्रत्याशित मोड़ आया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को लोकसभा में पहली बार विधायी हार का सामना करना पड़ा। महिला आरक्षण और सीटों की संख्या बढ़ाने से जुड़ा अहम संविधान (131वां) संशोधन विधेयक 2026 आवश्यक दो-तिहाई बहुमत प्राप्त न कर पाने के कारण गिर गया। पिछले 11 वर्षों में यह पहला अवसर है जब सरकार सदन में कोई प्रमुख बिल पास कराने में विफल रही है।

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आंकड़ों का गणित 54 वोटों से चूकी सरकार

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करीब 21 घंटे की मैराथन बहस के बाद हुए मतदान में सदन की गणितीय स्थिति सरकार के पक्ष में नहीं रही। लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करने के प्रस्ताव वाले इस बिल पर कुल 528 सांसदों ने मतदान किया:

पक्ष में: 298 वोट

विपक्ष में: 230 वोट

जरूरत: बिल पारित कराने के लिए 352 वोटों (दो-तिहाई बहुमत) की आवश्यकता थी, जिससे सरकार 54 वोट पीछे रह गई।

अन्य बिलों पर वोटिंग टाली

इस अहम बिल के गिरने के तुरंत बाद सरकार ने बैकफुट पर आते हुए परिसीमन संशोधन बिल 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल 2026 पर वोटिंग कराने से इनकार कर दिया। राजनीतिक गलियारों में इसे सदन में सरकार के अनिश्चित समर्थन और रणनीति में बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है।

सत्ता पक्ष और विपक्ष में तीखी तकरार

मतदान से पूर्व गृह मंत्री अमित शाह ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि बिल के गिरने की पूरी जिम्मेदारी विपक्ष की होगी और देश की महिलाएं इस व्यवहार को देख रही हैं। वहीं, बिल गिरने के बाद विपक्ष ने इसे लोकतंत्र की जीत बताया। राहुल गांधी ने इसे संविधान पर होने वाले हमले का बचाव करार दिया, जबकि प्रियंका गांधी वाड्रा ने इसे देश की एकता की जीत कहा। शशि थरूर ने स्पष्ट किया कि वे आरक्षण के विरोधी नहीं हैं, लेकिन इसे परिसीमन से जोड़ना गलत है।

विवाद का मुख्य कारण

विधेयक का मुख्य उद्देश्य महिला आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया को लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण (परिसीमन) से जोड़ना था। विपक्ष का आरोप था कि यह प्रक्रिया जटिल है और आरक्षण को टालने की एक कोशिश है। इसी बिंदु पर हुए गतिरोध ने अंततः बिल को गिरा दिया, जिसे मोदी सरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।