राम के वनगमन प्रसंग से श्रद्धालु हुए भाव-विभोर, माता-पिता का वचन निभाने की मिली सीख
राम के वनगमन प्रसंग से श्रद्धालु हुए भाव-विभोर, माता-पिता का वचन निभाने की मिली सीख


बीकानेर, 20 मई। मानस प्रचार समिति, लखोटिया चौक के बैनर तले स्थानीय नृसिंह सत्संग उद्यान में चल रहे संगीतमय श्री नवाह्न परायण पाठ के चौथे दिन प्रभु श्री राम के वनगमन और केवट संवाद के मर्मस्पर्शी प्रसंगों का सजीव व्याख्यान किया गया। इन प्रसंगों को सुनकर कथा पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं और पूरा माहौल भक्ति व वैराग्य के भाव से सराबोर हो उठा।


जोधपुर से पधारे मुख्य कथावाचक पंडित गिरधर गोपाल और सुशील आसोपा ने कथा की शुरुआत करते हुए बताया कि जब अयोध्यापति महाराज दशरथ प्रभु राम के राजतिलक की भव्य तैयारियां कर रहे थे, ठीक उसी समय रानी कैकेयी दासी मंथरा के बहकावे में आकर कोपभवन में चली गईं। दशरथ जब उन्हें मनाने पहुंचे, तो कैकेयी ने अपने पुराने दो वचनों के बदले भरत को राजसिंहासन सौंपने और प्रभु राम को 14 वर्ष का कठोर वनवास देने की मांग रख दी।


कथाव्यास सुशील आसोपा ने भावुक प्रसंग की व्याख्या करते हुए कहा कि जैसे ही प्रभु श्रीराम माता-पिता की आज्ञा और उनके वचनों का पालन करने के लिए राजसी वस्त्र त्यागकर वन के लिए प्रस्थान करते हैं, तो पूरी अयोध्या प्रजा, माता कौशल्या और सुमित्रा सहित उनके अनुज लक्ष्मण की आंखों से अश्रुधारा बह निकलती है। उन्होंने कहा कि यह प्रसंग हमें सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी अपने माता-पिता के वचनों और संस्कारों का पालन किस प्रकार अडिग रहकर किया जाता है।
कथा के अगले चरण में केवट संवाद का बेहद सुंदर और संगीतमय वर्णन किया गया। जब प्रभु राम, माता सीता और लक्ष्मण सहित गंगा पार जाने के लिए केवट से नाव मांगते हैं, तो वह नाव लाने से मना कर देता है। केवट कहता है कि उसने प्रभु के चरणों की महिमा सुनी है, जिसके स्पर्श से पत्थर की अहिल्या तर गई थी; इसलिए वह अपनी काठ की नाव को बचाने के लिए पहले प्रभु के चरण धोकर ही उन्हें नाव पर बैठाने की जिद करता है। महाराज श्री ने इस प्रसंग को रेखांकित करते हुए कहा कि केवट का यह हठ भक्ति में निश्छल प्रेम और प्रभु सानिध्य पाने के पावन ‘लालच’ के अद्भुत भावों को प्रकट करता है। संगीतमय भजनों पर झूमते हुए भक्तों ने आरती के बाद महाप्रसाद ग्रहण किया।


