जाते-जाते सिद्धारमैया का बड़ा दांव: कर्नाटक की जातिगत सर्वेक्षण रिपोर्ट मंजूर कर राहुल गांधी और डीके शिवकुमार के लिए खड़ी की सियासी मुश्किलें

जाते-जाते सिद्धारमैया का बड़ा दांव
STBA 5 JUNE 2026
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  • वोक्कालिगा समुदाय की नाराजगी का डीके शिवकुमार पर बढ़ेगा दबाव; राहुल गांधी के ‘जातिगत जनगणना’ के राष्ट्रीय स्टैंड की अग्निपरीक्षा

बेंगलुरु, 30 मई (वार्ता)। कर्नाटक के निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने पद छोड़ते-छोड़ते एक ऐसा बड़ा सियासी दांव चल दिया है, जिसने न केवल राज्य बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस नेतृत्व को गहरे असमंजस और मुश्किलों में डाल दिया है। सिद्धारमैया ने अपने कार्यकाल के अंतिम क्षणों में राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा तैयार की गई बहुप्रतीक्षित और विवादित ‘सामाजिक और शैक्षणिक सर्वेक्षण रिपोर्ट’ (जातिगत जनगणना) को प्रशासनिक रूप से मंजूरी दे दी है। राजनीति में कभी-कभी सरकारी फाइलें सिर्फ आगे नहीं बढ़तीं, बल्कि वे एक ऐसा सियासी मोहरा बन जाती हैं जो बड़े-बड़े सूरमाओं की नींद उड़ा देती हैं; कर्नाटक की यह रिपोर्ट भी फिलहाल ऐसा ही हथियार साबित हो रही है।

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डीके शिवकुमार के सामने अपने समुदाय को साधने का संकट
सिद्धारमैया द्वारा बेहद इत्मीनान और रणनीतिक चतुराई के साथ मंजूर की गई यह रिपोर्ट अब महज कोई प्रशासनिक दस्तावेज या साधारण सुझाव नहीं रह गई है, बल्कि यह एक ऐसा ज्वलंत सवाल बन चुकी है जिसका जवाब देना कांग्रेस के लिए टेढ़ी खीर है। इस फैसले का सबसे सीधा और पहला असर राज्य के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार पर पड़ता दिख रहा है। कर्नाटक का जातीय समीकरण बेहद संवेदनशील है। राज्य का रसूखदार वोक्कालिगा समुदाय, जिससे खुद डीके शिवकुमार आते हैं, इस सर्वेक्षण के तौर-तरीकों और आंकड़ों को लेकर पहले से ही आपत्ति जताता रहा है। यदि रिपोर्ट के आधार पर कोई भी कदम उठाया जाता है, तो वोक्कालिगा समुदाय की तीखी प्रतिक्रिया सड़कों पर देखने को मिल सकती है। ऐसे में शिवकुमार के सामने पार्टी अनुशासन को मानने और अपने कोर वोट बैंक (समुदाय) की भावनाओं के बीच संतुलन बनाए रखने की बेहद जटिल चुनौती खड़ी हो गई है।

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राहुल गांधी के राष्ट्रीय स्टैंड की जमीनी हकीकत पर परीक्षा
दूसरी ओर, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी के लिए यह परेशानी का एक अलग स्तर है। राहुल गांधी लंबे समय से राष्ट्रीय स्तर पर ‘जितनी आबादी, उतना हक’ के नारे के साथ जातिगत जनगणना कराने की वकालत करते आ रहे हैं। लेकिन अब जब कर्नाटक में उनकी ही पार्टी की सरकार के निवर्तमान मुख्यमंत्री ने इसे अमलीजामा पहनाने का रास्ता साफ कर दिया है, तो इसकी व्यावहारिक उलझनों से निपटना आसान नहीं होगा। मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस स्थिति को कांग्रेस के एक बड़े राजनीतिक विरोधाभास के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया है। भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर कुछ और भाषा बोलती है, लेकिन राज्यों में जब इसे लागू करने की बात आती है, तो वह हिचकिचाती है।

कांग्रेस के सामने दो रास्ते: दोनों ही राहें कांटों भरी

इस रिपोर्ट की मंजूरी के बाद अब कांग्रेस के सामने केवल दो ही रास्ते बचते हैं, और दोनों में से कोई भी रास्ता पार्टी के लिए आरामदायक नहीं है:

यदि रिपोर्ट को लागू नहीं किया जाता: तो पिछड़े समुदायों और सामाजिक न्याय के पैरोकारों के बीच जो बड़ी उम्मीदें जगी हैं, वे टूट जाएंगी। इसे कांग्रेस की राजनीतिक हिचकिचाहट और प्रशासनिक ईमानदारी की कमी के रूप में देखा जाएगा। तब इस रिपोर्ट को इस बात के लिए ज्यादा याद किया जाएगा कि इसके साथ इंसाफ नहीं किया गया।

यदि रिपोर्ट को लागू किया जाता है: तो इसके परिणाम तुरंत और बेहद आक्रामक होंगे। आरक्षण का नए सिरे से निर्धारण, विभिन्न समुदायों का प्रतिनिधित्व और जनसांख्यिकीय दावे सीधे राजनीति के केंद्र में आ जाएंगे। इसके साथ ही कानूनी पेचीदगियां बढ़ेंगी, विरोध-प्रदर्शन शुरू हो सकते हैं और कर्नाटक में आंतरिक दलीय संतुलन व गठबंधन को संभालना बेहद मुश्किल हो जाएगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सिद्धारमैया का यह कदम कोई साधारण कागजी या प्रक्रियात्मक कार्रवाई नहीं है। एक मंझे हुए और तजुर्बेकार सियासतदान की तरह उन्होंने अपनी जवाबदेही को बेहद खामोशी लेकिन मजबूती के साथ दूसरों के कंधों पर ट्रांसफर कर दिया है। उन्होंने यह सुनिश्चित कर दिया है कि उनके द्वारा उठाया गया यह ऐतिहासिक कदम अब सिर्फ उनका ही होकर न रह जाए, बल्कि आने वाले दिनों में पूरी कांग्रेस पार्टी को इस पर अपना रुख स्पष्ट करना ही पड़ेगा।

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