गोहत्या पर राष्ट्रीय कानून और ‘राष्ट्रीय पशु’ के दर्जे से केंद्र का साफ इंकार
गोहत्या पर राष्ट्रीय कानून और 'राष्ट्रीय पशु' के दर्जे से केंद्र का साफ इंकार


- गाय पर सियासत- चुनाव से पहले केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल का बड़ा बयान
- क्या भाजपा ने बदल दी अपनी चुनावी रणनीति? गोवंश संरक्षण को राज्यों के पाले में डाल केंद्र ने झाड़ा पल्ला
- उच्च न्यायालयों की टिप्पणियों के बाद भी केंद्रीय कानून बनाने से पीछे हटी सरकार; क्षेत्रीय राजनीति साधने का बड़ा पैंतरा
बीकानेर/नई दिल्ली, 1 जून । देश के राजनैतिक गलियारों में अक्सर ‘मास्टरस्ट्रोक’ माने जाने वाले गोवंश के मुद्दे पर केंद्र सरकार ने एक बेहद चौंकाने वाला और रणनीतिक यू-टर्न ले लिया है। केंद्रीय कानून एवं न्याय राज्य मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने संसद में एक लिखित जवाब के जरिए स्पष्ट कर दिया है कि केंद्र सरकार के पास वर्तमान में गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित करने या देश भर में ‘गोहत्या’ पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है।



संसद में लिखित जवाब के जरिए दी जानकारी
संसदीय कार्यवाही के दौरान पूछे गए एक सवाल के लिखित जवाब में केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने इस विषय पर सरकार का रुख पूरी तरह साफ किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में संवैधानिक और कानूनी पहलुओं का हवाला देते हुए बताया कि भारत के संविधान के तहत पशुधन का संरक्षण, सुरक्षा और इससे जुड़े कानूनों का निर्माण मुख्य रूप से राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र (राज्य सूची) का विषय है।


इस बयान को राजनीतिक विश्लेषक एक सोची-समझी बिसात के रूप में देख रहे हैं, जिसके जरिए केंद्र ने एक ही झटके में कई क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनैतिक समीकरणों को साधने का प्रयास किया है।
राजनैतिक चाल 1: राज्यों के पाले में गेंद डाल ‘क्षेत्रीय असंतोष’ से बचना
केंद्रीय मंत्री मेघवाल ने अपने बयान में संवैधानिक तकनीकी का सहारा लेते हुए कहा कि संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत पशुधन का संरक्षण ‘राज्य सूची’ (State List) का विषय है।
इसके पीछे की बड़ी राजनैतिक रणनीति
पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत को साधना: यदि केंद्र सरकार गोहत्या पर पूरे देश में एक समान कड़ा कानून लाती है, तो पूर्वोत्तर के राज्य (जैसे नागालैंड, मेघालय, मिजोरम) और दक्षिण भारत के राज्य (जैसे केरल, तमिलनाडु) में भारी राजनैतिक विरोध तय था। इन राज्यों में खान-पान की सांस्कृतिक विविधता के कारण भाजपा को भारी राजनैतिक नुकसान उठाना पड़ सकता था।
जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना: केंद्र ने इस संवेदनशील मुद्दे को राज्यों के पाले में डालकर खुद को सुरक्षित कर लिया है। अब विपक्ष केंद्र पर ‘सांप्रदायिक ध्रुवीकरण’ का सीधा आरोप नहीं लगा पाएगा, और जहां भी गोवंश से जुड़े विवाद होंगे, जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार की होगी।
राजनैतिक चाल 2: न्यायालयों के दबाव और ‘हिंदुत्व’ के एजेंडे में संतुलन
पिछले कुछ वर्षों में इलाहाबाद, जयपुर और अन्य उच्च न्यायालयों ने कई जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित करने की दिशा में विचार करने की गंभीर टिप्पणियां की थीं। इसके बाद दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा केंद्र पर चौतरफा दबाव बनाया जा रहा था कि सरकार संसद में पूर्ण बहुमत होने के बावजूद केंद्रीय कानून क्यों नहीं ला रही है।
कानून मंत्री का यह बयान इस दबाव को कम करने की एक चाल है:
सरकार ने यह संदेश दे दिया है कि वह न्यायालयों की भावनाओं का सम्मान तो करती है, लेकिन देश के संघीय ढांचे (Federal Structure) और संविधान के नियमों से बंधी हुई है।
इसके साथ ही, अधिकांश भाजपा शासित राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान) में पहले से ही गोवंश संरक्षण के बेहद कड़े कानून लागू हैं। ऐसे में केंद्र ने चतुरता से संदेश दिया कि उनका कोर एजेंडा राज्यों के माध्यम से पहले ही पूरा हो रहा है, इसलिए नए केंद्रीय कानून की कोई आवश्यकता नहीं है।
राजनैतिक चाल 3: अंतरराष्ट्रीय मंच पर छवि सुधार और आर्थिक हित
भारत दुनिया के सबसे बड़े बीफ (गोमांस/भैंस के मांस) निर्यातकों में से एक है, जिससे देश को हर साल अरबों डॉलर का विदेशी राजस्व प्राप्त होता है। इसके साथ ही, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत अक्सर विभिन्न मानवाधिकार और खान-पान की स्वतंत्रता से जुड़े सूचकांकों में घेरा जाता रहा है।
ग्लोबल इमेज का प्रबंधन: कानून मंत्री का यह बयान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि को एक ‘उदार और डाइवर्स (विविधतापूर्ण) लोकतंत्र’ के रूप में पेश करने की कोशिश है।
आर्थिक हितों की रक्षा: वैश्विक मंदी के इस दौर में सरकार व्यापारिक और निर्यात से जुड़े समीकरणों में कोई नया जोखिम नहीं उठाना चाहती। एक केंद्रीय कानून आने से देश के चमड़ा उद्योग और मांस निर्यात उद्योग को तगड़ा झटका लगता, जिससे लाखों लोग बेरोजगार हो सकते थे। चुनाव से ठीक पहले सरकार ऐसा कोई आर्थिक जोखिम लेने के मूड में नहीं है।
मांग के बावजूद केंद्रीय कानून से सरकार का इंकार; सोशल मीडिया पर पीएम मोदी का पुराना वीडियो वायरल
देश में गोवंश के संरक्षण और उसे राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में आ गई है। अनेक हिंदू और मुस्लिम संगठनों द्वारा देशव्यापी स्तर पर गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की लगातार की जा रही मांग के बीच, आज केंद्र सरकार ने इस विषय पर अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संसद में दो टूक शब्दों में कहा कि केंद्र सरकार के पास वर्तमान में न तो गोहत्या पर राष्ट्रव्यापी प्रतिबंध लगाने और न ही गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन है। सरकार की इस टिप्पणी के बाद जहां एक ओर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है, वहीं सोशल मीडिया पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।
सांस्कृतिक संगठनों की मांग और सरकार का रुख
लंबे समय से विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संगठनों—जिसमें कई मुस्लिम मंच भी शामिल हैं—द्वारा यह मांग उठाई जा रही थी कि सांप्रदायिक सौहार्द और धार्मिक श्रद्धा का सम्मान करते हुए गाय को राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक (राष्ट्रीय पशु) घोषित किया जाए और इसके वध पर देश भर में एक समान दंडात्मक कानून बने।
हालांकि, केंद्रीय कानून मंत्री ने संवैधानिक व्यवस्था का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार, पशुधन का संरक्षण और सुरक्षा ‘राज्य सूची’ (State List) का विषय है। ऐसे में देश के अधिकांश राज्यों ने अपनी स्थानीय और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार पहले से ही कड़े कानून बना रखे हैं, इसलिए केंद्र स्तर पर किसी नए कानून का प्रस्ताव वर्तमान में नहीं है।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ पुराना वीडियो
जानकारों के अनुसार, सरकार के इस आधिकारिक बयान के आते ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक पुराना वीडियो तेजी से वायरल होने लगा है। इस वीडियो में वह गोमांस (बीफ) निर्यात में भारत के आगे होने पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं। वीडियो में उन्हें यह कहते सुना जा सकता है कि “जब गाय हत्या की बात सुनता हूँ तो मेरा कलेजा रोता है।” इसके साथ ही वह जनसभा में श्रोताओं की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, “पता नहीं आप सब कैसे ये बर्दाश्त करते हैं।” इस पुराने बयान और वर्तमान नीति के बीच के अंतर को लेकर सोशल मीडिया यूजर्स और विपक्षी दल सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं।
विपक्ष और धार्मिक गुरुओं के तीखे प्रहार
सरकार की इस टिप्पणी के बाद राजनीतिक और धार्मिक हलकों से तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। आलोचकों और विपक्षी दलों का आरोप है कि यह रुख सत्तारूढ़ दल के ‘दोहरे चरित्र’ को उजागर करता है, जहां चुनावी मंचों पर धार्मिक भावनाओं का उपयोग किया जाता है, लेकिन जब व्यावहारिक कानून बनाने की बात आती है, तो प्रशासनिक मजबूरियों का बहाना बना दिया जाता है।
इस मुद्दे पर ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती के हालिया बयानों का भी हवाला दिया जा रहा है। शंकराचार्य लंबे समय से गोवंश को ‘राष्ट्रमाता’ का दर्जा दिलाने और गोहत्या के खिलाफ राष्ट्रव्यापी कड़े कानून के लिए आंदोलनरत हैं। उन्होंने अपने हालिया संबोधनों में केंद्र और उत्तर प्रदेश की सरकारों पर इस मामले में कथनी और करनी में अंतर होने के गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि जब समाज के सभी वर्ग, जिनमें मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधि भी शामिल हैं, गोवंश की रक्षा के लिए एकमत हैं, तब सरकार का पीछे हटना करोड़ों गोग्राम भक्तों की आस्था के साथ खिलवाड़ है। कानून मंत्री के इस बयान ने आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सियासी सरगर्मी और बढ़ने के संकेत दे दिए हैं।
निष्कर्ष: ‘सांप और लाठी’ दोनों बचाने की कोशिश
राजनैतिक विश्लेषकों के अनुसार, अर्जुनराम मेघवाल का यह बयान भाजपा की एक बेहद परिपक्व और सुरक्षित राजनैतिक चाल है। इसके जरिए पार्टी ने अपने कोर वोट बैंक को यह तसल्ली भी दे दी कि राज्यों में गोवंश सुरक्षा कानून मजबूत हैं, और दूसरी तरफ विपक्ष के उस सबसे बड़े हथियार को कुंद कर दिया जिसमें वह भाजपा पर ‘भोजन की स्वतंत्रता छीनने’ और ‘एकतरफा केंद्रीय कानून थोपने’ का आरोप लगाता था। आगामी चुनावों को देखते हुए इस बयान ने केंद्र सरकार के सिर से एक बहुत बड़ा राजनैतिक सिरदर्द हटा दिया है।


