लिखित इतिहास से कहीं अधिक प्रभावशाली ढंग से कहानी कहती हैं मौन वस्तुएं- डॉ. नितिन गोयल
लिखित इतिहास से कहीं अधिक प्रभावशाली ढंग से कहानी कहती हैं मौन वस्तुएं- डॉ. नितिन गोयल


बीकानेर, 27 जून । शहर की प्रतिष्ठित सांस्कृतिक व शैक्षणिक संस्था ‘अजित फाउण्डेशन’ द्वारा आयोजित मासिक संवाद और फड़ चित्रकला कार्यशाला का समापन समारोह गरिमामय माहौल में संपन्न हुआ। संवाद के अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में ‘‘अतीत की प्रतिध्वनियां: भारतीय उपमहाद्वीप की भौतिक संस्कृति‘‘ विषय पर विचार व्यक्त करते हुए प्रख्यात इतिहासवेत्ता डॉ. नितिन गोयल ने इतिहास को देखने और समझने का एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि इतिहास केवल राजा-महाराजाओं के महलों, सिंहासनों और युद्धों तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह उन साधारण वस्तुओं में भी सांस लेता है जिन्हें हम प्रतिदिन छूते हैं, देखते हैं और उपयोग करते हैं। सच तो यह है कि मौन वस्तुएँ, लिखित इतिहास से कहीं अधिक प्रामाणिक और प्रभावशाली ढंग से अतीत की गाथा बयां करती हैं।


डॉ. गोयल ने प्रख्यात लेखिका सुदेषना गुहा की चर्चित कृति ‘‘ए हिस्ट्री ऑफ इण्डिया थ्रू 75 ऑब्जेक्ट’’ को केंद्र में रखते हुए कहा कि इस पुस्तक ने वस्तुओं के माध्यम से इतिहास लेखन की एक नई और क्रांतिकारी शैली विकसित की है। यह किताब गहराई से इस बात का मूल्यांकन करती है कि वस्तुएँ चाहे मूल रूप में प्रामाणिक हों, उनकी प्रतिकृति (कॉपी) हो या वे किसी माध्यम से प्रदर्शित की गई हों, समय के साथ उनके भौतिक स्वरूप और अर्थ में आने वाले बदलावों को समझना इतिहास के अध्ययन के लिए कितना महत्वपूर्ण है।


उन्होंने बताया कि इस पुस्तक की सबसे अनोखी बात यह है कि यह पाठक को यह देखने का मार्गदर्शन देती है कि इतिहास स्थिर नहीं है बल्कि हमेशा निर्माण की प्रक्रिया में रहता है। पुस्तक में शामिल 75 प्रमुख वस्तुओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें राजस्थान की प्रसिद्ध फड़ चित्रशैली, एम्बेसडर कार, गोदरेज का ताला, एलआईसी (LIC) का सिंबल, कावड़ शैली और ‘अमूल गर्ल’ जैसी उन तमाम वस्तुओं को शामिल किया गया है जो कभी हमारे देश और समाज की रोजमर्रा की दिनचर्या का अटूट हिस्सा हुआ करती थीं।
फड़ चित्रकला कार्यशाला का समापन: लुप्त होती लोककलाओं का होगा पुनरुत्थान
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ शिक्षाविद् डॉ. अशोक शर्मा ने नई पीढ़ी को लोककलाओं से जोड़ने की वकालत की। उन्होंने कहा कि हमें फड़ चित्रकला जैसी पारंपरिक विधाओं को आगे बढ़ाना चाहिए, जिससे लुप्त हो रही हमारी अनमोल लोककलाओं का वास्तविक पुनरुत्थान हो सके। युवाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि इतिहास हमें वह सब कुछ सिखाता है जिसे हमारे पूर्वजों ने जिया और हमारे लिए विरासत के रूप में छोड़ा है।
कार्यक्रम के अगले चरण में आयोजित ‘फड़ चित्रकला कार्यशाला’ के समापन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित वरिष्ठ चित्रकार डॉ. राकेश किराड़ू ने कहा कि कला को कभी भी भौगोलिक या वैचारिक सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। संगीत हो या लोक चित्रकला, उसका कैनवास पूरा विश्व होता है। कला हर तरह के बंधनों को तोड़कर व्यक्तियों और समाजों को आपस में जोड़ने का सबसे पवित्र माध्यम है। संस्था समन्वयक संजय श्रीमाली ने लोक कलाओं को जीवित रखने के लिए इस तरह की कार्यशालाओं को निरंतर आयोजित करने की आवश्यकता पर बल दिया ताकि नए कलाकारों को एक बेहतर मंच मिल सके।
समारोह के अंतिम पड़ाव में शिक्षाविद् विजयशंकर आचार्य ने सभी आगंतुकों और विद्वानों का आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया। इसके पश्चात मंचस्थ अतिथियों द्वारा कार्यशाला में भाग लेने वाले सभी संभागियों व युवा प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया गया। इस ऐतिहासिक विमर्श और कला समागम के दौरान नदीम अहमद नदीम, अरमान नदीम, हनीफ उस्ता, गिरिराज पारीक, मोहम्मद फारूक, सुनीता श्रीमाली, उषा बिस्सा, शिव दाधीच, बाबूलाल, गौरीशंकर शर्मा सहित कला जगत से जुड़े कई गणमान्य लोग और युवा-युवतियां उपस्थित रहे।


