शरण भाव से हो हमारी भक्ति -साध्वी प्रीतिसुधा
शरण भाव से हो हमारी भक्ति -साध्वी प्रीतिसुधा




- मंदिर जाने और धार्मिक क्रियाओं के साथ मन का परमात्मा से जुड़ना आवश्यक
बीकानेर, 24 सितंबर। रांगड़ी चौक स्थित पौषधशाला में तपागच्छीय गच्छाधिपति पद्मश्री आचार्य श्रीमद् विजय नित्यानंदसूरिश्वरजी महाराज साहेब की आज्ञानुवर्तिनी साध्वीश्री प्रीतिरत्ना, साध्वीश्री प्रीतिसुधा एवं साध्वीश्री प्रीतियशा महाराजसा आदि ठाणा-3 के पावन सानिध्य में गुरुवार को धर्मसभा का आयोजन किया गया। धर्मसभा को संबोधित करते हुए साध्वीश्री प्रीतिसुधा महाराज सा ने कहा कि हमारी भक्ति केवल बाह्य धार्मिक क्रियाओं तक सीमित न रहकर पूर्ण शरण भाव और समर्पण से परिपूर्ण होनी चाहिए। मनुष्य मंदिर जाकर पूजा-आराधना और धार्मिक कर्तव्य तो करता है, लेकिन जब तक मन और अंतरात्मा उससे नहीं जुड़ते, तब तक साधना अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकती। परमात्मा की शरण स्वीकार करने के बाद प्रार्थना में समर्पण, श्रद्धा और आंतरिक जुड़ाव होना अत्यंत आवश्यक है।


धन के उपयोग और उसके अर्जन के संबंध में साध्वीश्री ने कहा कि धन जिस भाव और प्रवृत्ति से अर्जित किया जाता है, उसका सीधा प्रभाव उसके व्यय पर भी दिखाई देता है। पुण्य और सदाचार से अर्जित धन स्वतः ही धर्म, सामाजिक सेवा और जन कल्याणकारी कार्यों में प्रयुक्त होता है, जबकि अनुचित माध्यमों से प्राप्त धन गलत प्रवृत्तियों में ही व्यय होने की आशंका बनी रहती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म केवल दिखाई देने वाली बाह्य क्रिया नहीं, बल्कि मन, आचरण और व्यवहार में उतरने वाली एक गहन साधना है।


प्राचीन सामाजिक ताने-बाने और आत्मीय संबंधों का स्मरण कराते हुए साध्वीश्री ने चिंता व्यक्त की कि वर्तमान में भौतिक सुविधाएं तो बढ़ी हैं, लेकिन जीवन का वास्तविक आत्मिक आनंद पीछे छूट गया है। पहले परिवारों और पड़ोस में सहयोग तथा सामूहिकता की भावना अधिक थी, जहाँ शादी-विवाह जैसे मांगलिक कार्य आपस में जुड़ने का माध्यम बनते थे। आज भले ही आयोजनों पर भारी-भरकम धनराशि खर्च की जा रही है, परंतु आत्मीयता और सहज आनंद कम होता जा रहा है। उन्होंने आधुनिक दौर में भौतिक साधनों के बीच भी संबंधों की सहजता और आत्मिक आनंद को जीवंत बनाए रखने पर बल दिया।
साधु-साध्वियों की वैयावच्च और सेवा परंपरा का उल्लेख करते हुए साध्वीश्री ने कहा कि प्राचीन काल में सामान्य परिवार भी साधु-संतों को गोचरी देने तथा सेवा कार्यों में श्रद्धापूर्वक सहभागी होते थे। सेवा का मूल आधार प्रदर्शन न होकर निर्मल भाव और आस्था हुआ करता था। वर्तमान में सेवा भाव से बढ़ती दूरी को चिंताजनक बताते हुए उन्होंने कहा कि यदि वर्तमान पीढ़ी स्वयं साधु-साध्वियों की सेवा, साधर्मिक सहयोग और धार्मिक संस्कारों से नहीं जुड़ेगी, तो आने वाली पीढ़ी इन मूल्यों को कैसे सीखेगी। धर्म को केवल आयोजनों तक सीमित न रखकर परिवार की दिनचर्या और संस्कारों में ढालना आवश्यक है।
चातुर्मास लाभार्थी परिवार के सुरेंद्र बद्धाणी ने जानकारी दी कि शनिवार को उदयरामसर में मेला होने के कारण प्रवचन का मंगल (अवकाश) रहेगा, जबकि रविवार को पौषधशाला में धर्मज्ञान प्रश्न प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। चातुर्मास के दौरान जप-तप, पूजा और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों का क्रम अविरल जारी है। वहीं चातुर्मास लाभार्थी परिवार के शांतिलाल सेठिया ने बताया कि आज का क्रमिक आयंबिल कनक-मनीष कोचर ने किया, जबकि बीती कल का आयंबिल अंजू-नरेंद्र कोचर द्वारा संपन्न किया गया था। इसके साथ ही आज की श्रीसंघ पूजा का लाभ ताराचंद-खेमचंद डागा परिवार द्वारा लिया गया।
