बीकानेर में ‘दुर्लभ बीमारियों’ पर मंथन: 7 से 10 साल निदान में भटकने से बचाने के लिए विशेषज्ञों ने दिया ‘शीघ्र पहचान’ का मंत्र

बीकानेर में 'दुर्लभ बीमारियों' पर मंथन
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खमत खामणा

बीकानेर, 15 फरवरी। भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय, एम्स जोधपुर और बीकानेर के सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को “दुर्लभ बीमारियां: कारण एवं उपचार” विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। होटल मरुधर पैलेस में आयोजित इस वैज्ञानिक सत्र में विशेषज्ञों ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि दुर्लभ रोगों के सही निदान (Diagnosis) तक पहुँचने में बच्चों के जीवन के कीमती 7 से 10 वर्ष व्यर्थ हो जाते हैं, जिसे ‘डायग्नोस्टिक ओडिसी’ कहा जाता है।

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कार्यशाला के मुख्य वक्ता एवं पीडियाट्रिक विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. जी. एस. तंवर ने चौंकाने वाले आंकड़े साझा करते हुए बताया कि दुनिया के 20 प्रतिशत दुर्लभ रोगों के मरीज भारत में हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब कोई बीमारी 2,000 व्यक्तियों में से केवल एक को प्रभावित करती है, तो उसे ‘दुर्लभ’ माना जाता है। वर्तमान में पहचानी गई 7,000 बीमारियों में से केवल 63 का ही पुख्ता उपचार उपलब्ध है, जिनमें से 80 प्रतिशत जेनेटिक (आनुवंशिक) होती हैं।

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एम्स जोधपुर बना ‘उत्कृष्टता केंद्र’: आर्थिक सहायता का भी प्रावधान
एम्स जोधपुर के डॉ. कुलदीप सिंह ने बताया कि दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित बच्चों के लिए एम्स जोधपुर में ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ स्थापित किया गया है। उन्होंने भ्रांतियों को दूर करते हुए कहा कि अंधविश्वास और इलाज के भारी खर्च के डर से कई परिवार पीछे हट जाते हैं, जबकि सरकार अब विभिन्न योजनाओं के माध्यम से बड़ा आर्थिक सहयोग दे रही है।

डॉ. तंवर ने जानकारी दी कि राजस्थान सरकार मुख्यमंत्री आयुष्मान बाल संबल योजना के तहत ऐसे बच्चों को 5,000 रुपये प्रति माह की आर्थिक सहायता प्रदान कर रही है। वर्तमान में राजस्थान के 302 मरीज आईसीएमआर पोर्टल पर पंजीकृत हैं, जिनमें से आधे मामले ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (DMD) के हैं। इसके लिए बीकानेर में हर माह के दूसरे शनिवार को विशेष ‘डीएमडी क्लिनिक’ संचालित किया जा रहा है।

रोकथाम ही उपचार: गर्भावस्था में जांच है अनिवार्य
कार्यशाला में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. चारू शर्मा और अतिरिक्त प्रोफेसर डॉ. वरुणा व्यास ने बचाव के पहलुओं पर जोर दिया। विशेषज्ञों ने कहा कि नियमित प्रसव-पूर्व जांच (Antenatal Checkup) और भ्रूण की आनुवंशिक जांच से कई दुर्लभ बीमारियों को जन्म से पहले ही पहचाना और रोका जा सकता है। डॉ. सीताराम डीडेल ने भी त्वरित नैदानिक सतर्कता (Clinical Alertness) को समय पर उपचार की पहली कड़ी बताया।

चिकित्सा जगत के दिग्गजों की रही उपस्थिति
अतिरिक्त प्राचार्य डॉ. एन. एल. महावर ने एम्स जोधपुर और बीकानेर की टीम के इस अकादमिक तालमेल की सराहना की। कार्यशाला में डॉ. पी. सी. खत्री, डॉ. सी. के. चाहर, डॉ. पी. के. बेरवाल, डॉ. रेणु अग्रवाल सहित जिले के कई वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ और रेजिडेंट डॉक्टर शामिल हुए। कार्यक्रम के अंत में डॉ. कुलदीप सिंह और उनकी टीम को साफा व प्रशस्ति-पत्र भेंट कर सम्मानित किया गया।

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