जैन, बौद्ध और वैदिक तीनों परंपरा में संयम परम्परा का महत्व

जैन, बौद्ध और वैदिक तीनों परंपरा में संयम परम्परा का महत्व
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बेंगलुरु , 27 अक्टूबर। माघावरम् के विशाल प्रांगण में ” संयम जीवन का महत्व” को उजागर करते हुए साध्वी श्री डॉ गवेषणाश्री जी ने कहा- भारतीय संस्कृति में संयम का अपना महत्व है। आज भी इस संस्कृति का सम्मान है। जैन, बौद्ध और वैदिक तीनों परंपरा में संयम परम्परा का महत्व है। संयम की भारत अद्भूत् है, जिसके आधार पर संपूर्ण संसार टिका हुआ है। विराट वैभव को पाने का अद्‌भूत मौका है। यह एक पवित्र संस्कार है।

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साध्वी श्री मयंकप्रभा जी ने कहा- जैसे हिटलर और ईसा, राम और रावण दिन एवं रात, स्फटिक और कांच में अंतर है वैसे ही संयम और असंयम, योग एवं भोग में अंतर है। संयम का तात्पर्य है पापकर्म से उपरत होना।साध्वी श्री दक्षप्रभा जी ने कहा सुमधुर गीतिका प्रस्तुत की।

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संयम जीवन का महत्व विषय पर काय्शाला

इस कार्यशाला के अन्तर्गत सचित – अचित, सुसता – असूसता, पाडिहारिय, अहिंसा, दान आदि अनेक बातों की छोटी-छोटी जानकारियां साध्वीश्रीजी ने हमें बतायी। इस कार्यशाला में लगभग 50 बच्चों ने भाग लिया।

इस कार्यशाला की सुव्यवस्था में श्रीमती इन्द्रा रांका, श्रीमती नीलम आच्छा व श्रीमती कविता मेडतवाल की सक्रिय भूमिका रही। साधु जीवन के उपकरणों से मेमोरी प्रतियोगिता की शानदान प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसमे प्रथम कुलदीप रांका,तन्मय-हर्षित द्वितीय तथा तृतीय हष्टि वैद रही l

गोचरी कैसे होती है स्वयं बच्चों ने घर – घर जाकर गोचरी की l धन्यवाद ज्ञापन प्रशिक्षिका श्रीमती नीलम आच्छा ने दिया । माधावरम ट्रस्ट के सभी कार्यकर्ता ने उत्साहवर्धन किया l

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