बीकानेर में सजी शे’री नशिस्त: डॉ. मोहम्मद हुसैन के सम्मान में शायरों ने बांधा समां, उर्दू अदब की महक से महकी फिजा
बीकानेर में सजी शे'री नशिस्त: डॉ. मोहम्मद हुसैन के सम्मान में शायरों ने बांधा समां, उर्दू अदब की महक से महकी फिजा


- बीकानेर की साहित्यिक परंपरा में उर्दू अदब का योगदान उल्लेखनीय: कमल रंगा
- मीर-ओ-गालिब के अंदाज से लेकर समकालीन दौर के नवाचारों पर झूमे श्रोता
बीकानेर, 24 मई। “बीकानेर की समृद्ध साहित्यिक परंपरा में उर्दू अदब का योगदान बेहद उल्लेखनीय है। समकालीन दौर में भी, विशेषकर शायरी में नए प्रयोग और नव रंगत की महक साफ महसूस की जा सकती है।” यह उद्गार वरिष्ठ कवि एवं कथाकार कमल रंगा ने व्यक्त किए। वे रविवार को बीकानेर साहित्य संस्कृति कला संगम की ओर से नज़ीर ग़ौरी सभागार में आयोजित एक विशेष शे’री नशिस्त (काव्य गोष्ठी) की अध्यक्षता कर रहे थे। यह महफिल प्रख्यात उर्दू शायर और समालोचक प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद हुसैन के सम्मान में सजाई गई थी, जो श्रोताओं के लिए एक यादगार शाम साबित हुई।


कमल रंगा की राजस्थानी कविता और डॉ. हुसैन की गजलें बनीं आकर्षण


कला संगम के संस्थापक अध्यक्ष व शायर कासिम बीकानेरी ने बताया कि नशिस्त की अध्यक्षता करते हुए कमल रंगा ने अपनी राजस्थानी कविता की इन पंक्तियों के माध्यम से श्रोताओं की भरपूर दाद बटोरी:
‘सुपनां रै रंगां राच्योड़ी, बणी ठणी थूं, कद बदल लीन्हौ भेख, ठाह ही नीं पड़ी।’
समारोह के मुख्य अतिथि डॉ. मोहम्मद हुसैन ने अपनी अनूठी और उम्दा गजलों के प्रस्तुतीकरण से महफिल को परवान चढ़ाया। विशेषकर उनकी गजल के इस मतले और शेर को श्रोताओं ने दिल खोलकर सराहा:
‘मुश्को-अंबर से फ़ुज़ुं लफ़्ज़ों से ख़ुशबू आए, तेरी दहलीज़ को गर फ़िक्र मेरी छू आए।’
‘फ़िक्र में रंग भरे लहजे से ख़ुशबू आए, मीर-ओ-ग़ालिब की तरह हमको जो उर्दू आए।’
डॉ. हुसैन ने गजल विधा में नए प्रयोगों और अपने खास अंदाज से ऐसा समां बांधा कि सभागार तालियों से गूंज उठा।
वरिष्ठ और युवा शायरों के कलाम पर बरसी दाद
नशिस्त में आमंत्रित अन्य नामचीन शायरों ने भी एक से बढ़कर एक रचनाएं पेश कीं:
कासिम बीकानेरी: उनके इस शेर को बहुत सराहा गया— ‘मुश्को अंबर की क्या ज़रूरत है, खत में कोई गुलाब आने दो।’
वली मोहम्मद गौरी: उनके इस जज्बाती शेर पर खूब दाद मिली— ‘क्या ख़बर थी चलते-चलते हादसा हो जाएगा, जो सफ़र में हम-सफ़र है वो जुदा हो जाएगा।’
इरशाद अजीज: उन्होंने तरन्नुम (लय) में गजल गाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया— ‘साहिल पे आके डूबने वाले ने यूँ कहा, तूफ़ान मेरे दिल में है दरिया में कुछ नहीं।’
राजेंद्र स्वर्णकार: वरिष्ठ गजलकार ने मां की ममता को छूते इस शेर से सभी को भावुक कर दिया— ‘मैं सफ़र पे चला जब भी परदेश को, मेरी मां के नयन डबडबाते रहे।’
रे शीन बीकानेरी (रवि शुक्ला): उन्होंने अपने इस मतले से महफिल में नया रंग भरा— ‘आंखों से मयकशी का मज़ा हमसे पूछिए, रस्मन कभी-कभी का मज़ा हमसे पूछिए।’
नौजवान रचनाकारों ने बयां किए आज के हालात
महफिल में युवा शायरों ने भी अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज कराई। नौजवान शायर मोइनुद्दीन ‘मुईन’ ने अपने अलग अंदाज में शेर पढ़ा: ‘ज़रा बतलाओ दिल की ख़ैर ख़्वाही चाहने वालों, शहर से उन के आते हो मेरे ग़म की दवा लाए।’ वहीं, युवा शायर माजिद खान माजिद ने समकालीन हालातों पर तीखा तंज कसते हुए पढ़ा: ‘हवाओं में सियासत हो रही है, ज़हर सब में उतारा जा रहा है।’
इससे पूर्व शे’री नशिस्त का विधिवत आगाज हाफिज जिया मोहम्मद बीकानेरी ने ‘तिलावते कलामे पाक’ (पवित्र कुरान की आयतों के पाठ) से किया। कार्यक्रम की शुरुआत में मुफ्ती अशफाक गौरी रजवी ने नशिस्त में तशरीफ लाए सभी शोअरा (शायरों) का गर्मजोशी से इस्तकबाल (स्वागत) किया। महफिल के समापन पर वली मोहम्मद गौरी ने सभी आगंतुकों और श्रोताओं का आभार व शुक्रिया अदा किया।


