राजस्थान चुनाव से ढाई साल पहले 10 जनपथ पर गहलोत की ‘जादूगरी’, गांधी परिवार के ट्रस्टों को बचाने के लिए सोनिया गांधी ने किया याद
ashok gehlot cm rajasthan



जयपुर/दिल्ली, 26 जून । राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत की करीब साढ़े तीन साल के लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर कांग्रेस के सबसे बड़े दिल्ली दरबार यानी ’10 जनपथ’ पर एंट्री हो गई है। हालांकि, यह आमद संकट से घिरे गांधी परिवार के विभिन्न चैरिटेबल ट्रस्टों को कानूनी उलझनों से सुरक्षित रखने की रणनीति के मद्देनजर हुई है, लेकिन राजस्थान के सियासी हलकों में इसे बेहद अलग और गहरे नजरिए से देखा जा रहा है। सोनिया गांधी के दरबार में गहलोत की इस मौजूदगी ने मरुधरा की राजनीति में कांग्रेस के भीतर नए समीकरणों के बनने और पुराने गणित के बिगड़ने की चर्चाओं को एक बार फिर हवा दे दी है।


पार्टी के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक, राजीव गांधी ट्रस्ट और गांधी परिवार से जुड़े अन्य प्रमुख ट्रस्टों पर विदेशी अंशदान विनियमन कानून (FCRA) के नए सख्त नियमों के तहत मंडरा रहे संकट से निपटने के लिए सोनिया गांधी ने दिल्ली में एक आपात बैठक बुलाई थी। इस ‘क्लोज डोर मीटिंग’ में रणनीति तैयार करने के लिए सोनिया गांधी ने अपने सबसे पुराने और कानूनी व प्रशासनिक रूप से वफादार दिग्गजों को याद किया। गुरुवार को हुई इस उच्चस्तरीय बैठक में अशोक गहलोत के अलावा मुकुल वासनिक, पवन बंसल, जनार्दन द्विवेदी और सलमान खुर्शीद जैसे वरिष्ठ नेता शामिल हुए। बताया जा रहा है कि इन ट्रस्टों से जुड़ा एक अहम मामला सीधे तौर पर राजस्थान से भी संबद्ध है, जिसके चलते गहलोत की भूमिका यहां अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है।


मुलाकात वन-टू-वन नहीं, पर मायने बड़े; पायलट समर्थकों की बढ़ी चिंता
भले ही इस बैठक के दौरान अशोक गहलोत की सोनिया गांधी से अकेले में सीधी (वन-टू-वन) बातचीत नहीं हुई हो, लेकिन दस जनपथ के बंद कमरे में उनकी सक्रिय मौजूदगी ने राज्य के सियासी गलियारों में कई बड़े संकेत दे दिए हैं। राजस्थान में आगामी विधानसभा चुनावों में अभी करीब ढाई साल का समय शेष है, ऐसे में इस अचानक हुए घटनाक्रम ने सचिन पायलट खेमे और उनके समर्थकों के बीच चिंता की लकीरें खींच दी हैं। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के समय से ही पार्टी के वफादार रहे अशोक गहलोत को अखिल भारतीय कांग्रेस में ‘संकटमोचक’ माना जाता है, जो अपने अगाध राजनीतिक अनुभव और प्रशासनिक सूझबूझ के बूते पार्टी को कई बड़े झटकों से उबार चुके हैं।
2022 की उस ‘चोट’ के बाद बढ़ गई थीं दूरियां
राजनीतिक विश्लेषक याद करते हैं कि साल 2018 में राजस्थान में कांग्रेस की जीत के बाद जब मुख्यमंत्री पद को लेकर पेंच फंसा था, तब राहुल गांधी की दुविधाओं के बीच गहलोत ने 10 जनपथ के मजबूत समर्थन से ही बाजी अपने नाम की थी। लेकिन, 25 सितंबर 2022 को जब सोनिया गांधी ने मल्लिकार्जुन खड़गे और अजय माकन को जयपुर भेजकर ‘सत्ता हस्तांतरण’ और सचिन पायलट को कमान सौंपने की रायशुमारी करनी चाही, तो गहलोत समर्थक विधायकों की अनुपस्थिति के कारण वह प्रक्रिया विफल हो गई थी। इस घटना को आलाकमान के खिलाफ एक परोक्ष ‘बगावत’ के रूप में देखा गया, जिसके बाद 10 जनपथ से गहलोत की दूरियां बढ़ गईं। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद से गहलोत की दिल्ली दरबार में पूछ-परख काफी कम हो गई थी।
गहलोत की डगर अब नहीं होगी आसान; डोटासरा, जूली और पायलट की तिकड़ी मजबूत
भले ही साढ़े तीन साल बाद गहलोत ने 10 जनपथ पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर अपना राजनीतिक रुतबा फिर से कायम करने का कार्ड खेला हो, लेकिन इस बार उनकी राह में कई नई चुनौतियां खड़ी हैं। वर्तमान में राजस्थान कांग्रेस के भीतर सचिन पायलट की ‘क्राउड पुलर’ और हाई फेस वैल्यू वाली छवि बेहद मजबूत है, विशेषकर केरल के हालिया चुनावों में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) के शानदार प्रदर्शन में उनकी भूमिका के बाद उनका कद राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ा है। साथ ही, प्रदेश में राहुल गांधी के हालिया दौरों के दौरान पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली को जिस तरह से तरजीह मिली है, वह भी राज्य के नए पावर सेंटर की ओर इशारा करती है। बहरहाल, राजनीति के इस ‘जादूगर’ की थाह लेना आसान नहीं है, और देखना दिलचस्प होगा कि गहलोत आने वाले दिनों में दिल्ली दरबार से मिले इस नए जुड़ाव का इस्तेमाल अपने फेवर में करने के लिए कौन सा ‘तुरूप का पत्ता’ चलते हैं।


