साधु-साध्वियों को आहार-पानी देने में बरतें सावधानी: मुनि श्री मधुर
साधु-साध्वियों को आहार-पानी देने में बरतें सावधानी: मुनि श्री मधुर


बीकानेर, 20 अगस्त । अखिल भारतीय साधुमार्गी जैन संघ के नवम पट्टधर आचार्य प्रवर 1008 श्री रामलालजी म.सा. एवं उपाध्याय प्रवर श्री राजेश मुनि के चातुर्मास (समर्पण महोत्सव-2026) के तहत छबीली घाटी स्थित सेवा सदन में श्राविकाओं के लिए “अब नहीं तो फिर कब” विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया। गुरुवार को कार्यशाला को संबोधित करते हुए मुनि श्री मधुर ने साधु-साध्वियों को दिए जाने वाले गोचरी (आहार-पानी) में बरती जाने वाली सावधानियों पर मार्गदर्शन दिया।


46 प्रकार के दोषों से मुक्त हो निर्दोष आहार


साधुमार्गी महिला मंडल की अध्यक्ष ललिता बांठिया ने बताया कि मुनिश्री ने निर्दोष आहार के महत्व को विस्तार से समझाया। मुनिश्री ने कहा कि साधु-संतों को दिया जाने वाला भोजन पूरी तरह शुद्ध, पवित्र और जैन परंपराओं के अनुकूल होना चाहिए।
निर्दोष आहार का अर्थ: जिस भोजन को बनाने और साधु-संतों को देने में 46 प्रकार के दोषों (उद्गम, उत्पादक एवं एषणा दोष) का पूरी तरह परिहार किया गया हो, वही निर्दोष आहार कहलाता है।
सावधानियां: भोजन किसी साधु के लिए विशेष रूप से नियोजित (स्पेशल) न बनाया गया हो, उसमें किसी प्रकार की अशुद्धता, जीव-जंतु, बाल या हिंसा का दोष न हो।
भवी और अभवी जीव में अंतर
संबोधन के दौरान मुनिश्री ने भवी और अभवी जीव की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए बताया कि ‘भवी जीव’ में भविष्य में कभी न कभी मोक्ष प्राप्त करने की स्वाभाविक योग्यता होती है, जबकि ‘अभवी जीव’ में मोक्ष प्राप्त करने की पात्रता नहीं होती। उन्होंने कहा कि अभवी जीव भी साधु-साध्वियों को निर्दोष आहार का दान देकर पुण्य का संचय कर सकता है।
