विभाजन-विभीषिका मनुष्य की पीड़ा, विस्थापन, संघर्ष व जीवट की मार्मिक कहानी: राजस्थानी संगोष्ठी में वक्ताओं ने रखे विचार

विभाजन-विभीषिका मनुष्य की पीड़ा, विस्थापन, संघर्ष व जीवट की मार्मिक कहानी: राजस्थानी संगोष्ठी में वक्ताओं ने रखे विचार
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  • विस्थापितों ने शरणार्थी नहीं, पुरुषार्थी बनकर देश को सशक्त किया: मुख्य अतिथि राजेश चूरा

बीकानेर, 13 अगस्त । राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी तथा इन्टेक बीकानेर के संयुक्त तत्वावधान में गुरुवार को ‘हर घर तिरंगा अभियान’ के तहत रोटरी क्लब सभागार में ‘विभाजन-विभीषिका’ विषय पर राजस्थानी संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में वक्ताओं ने विभाजन के समय हुए अमानवीय विस्थापन, मानवीय संवेदनाओं और शरणार्थियों के संघर्ष गाथा पर गहन प्रकाश डाला।

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कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राजेश चूरा ने अपने संबोधन में कहा कि विभाजन की त्रासदी मनुष्य की पीड़ा, विस्थापन और अदम्य जीवटता की ऐसी मार्मिक कहानी है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए लोगों ने भारत में ‘शरणार्थी’ कहलाने के बजाय अपनी मेहनत से ‘पुरुषार्थी’ बनकर देश के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक ढांचे को नई मजबूती प्रदान की।

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स्वतंत्रता के उल्लास के बीच विस्थापन की टीस
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए मनमोहन कल्याणी ने कहा कि 1947 में जब देश में स्वतंत्रता के उल्लास भरे गीत गूंज रहे थे, वहीं दूसरी ओर लाखों लोग अपनी ही मातृभूमि में बेघर होकर जीवन की नई शुरुआत करने को मजबूर थे। डॉ. नंदलाल वर्मा ने विस्थापितों के अदम्य साहस और जिजीविषा को भावी पीढ़ी के लिए अनुकरणीय बताया।

इन्टेक बीकानेर के कन्वीनर एवं कार्यक्रम संचालक पृथ्वीराज रतनू ने कहा कि विभाजन की एक रेखा ने रातों-रात असंख्य लोगों के गांव, घर, खेत, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, पड़ोसी और स्मृतियां दूसरे देश की सीमा में बांध दिए। मुख्य वक्ता संग्रामसिंह सोढ़ा ने कहा कि विभाजन केवल भू-भाग का बंटवारा नहीं था, बल्कि विस्थापितों की भाषा, पहनावा, रिश्ते, लोकगीत और सदियों पुरानी परंपराएं भी पीछे छूट गईं। उन्होंने अपनी राजस्थानी कविता के माध्यम से विस्थापन के दर्द की मार्मिक प्रस्तुति दी।

साहित्य में जीवंत है विभाजन का दर्द
अकादमी सचिव शरद केवलिया ने साहित्य की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि इतिहास केवल आंकड़े और तिथियां देता है, जबकि साहित्य उस कालखंड की मानवीय वेदना को महसूस कराता है। डॉ. नमामीशंकर आचार्य ने वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. मदन केवलिया की आत्मकथा ‘सिंध दरियाव सूं रेत रै समन्दर तांई’ पर व्याख्यान देते हुए कहा कि डॉ. केवलिया ने विभाजन के दंश को स्वयं झेला था, जिसे उन्होंने आत्मकथा के जरिए जीवंतता से उकेरा है।

डॉ. गौरीशंकर प्रजापत, सुधा आचार्य एवं डॉ. कृष्णलाल बिश्नोई ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि नई पीढ़ी को यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि स्वतंत्रता कितनी बड़ी कीमत और संघर्ष के बाद मिली है। अंत में रोटरी क्लब के अध्यक्ष प्रवीण गुप्ता ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

इस अवसर पर घनश्याम कोठारी, अमर सिंह खंगारोत, आवड़ दान चारण, एम.एल. जांगिड़, भंवर सिंह, सुरेश व्यास, डॉ. ललित कुमार वर्मा एवं रामगोपाल मारू सहित अनेक साहित्यप्रेमी और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

 

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