सीताराम भवन में श्री राम कथा अमृतोत्सव: ‘कभी-कभी भगवान को भक्तों से काम पड़े’ – पंडित पुरुषोत्तम व्यास

सीताराम भवन में श्री राम कथा अमृतोत्सव: ‘कभी-कभी भगवान को भक्तों से काम पड़े’ - पंडित पुरुषोत्तम व्यास
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quicjZaps 15 sept 2025

बीकानेर, 21 मई। स्थानीय सीताराम गेट के भीतर स्थित सीताराम भवन में आयोजित ‘श्री रामकथा अमृतोत्सव’ के सातवें दिन गुरुवार को भक्ति और वैराग्य की अविरल धारा बही। कथा के दौरान भगवान श्री राम के वनवास गमन और केवट प्रसंग का ऐसा मार्मिक वर्णन किया गया कि उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे। श्रीमती पुष्पा देवी सोमानी (धर्मपत्नी स्वर्गीय श्री सीताराम जी) एवं समस्त सोमानी परिवार द्वारा आयोजित यह कथा आगामी 24 मई तक प्रतिदिन दो सत्रों (दोपहर 12:30 से 3:30 और शाम 4:00 से 7:00 बजे) में संचालित की जा रही है।

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त्याग और कर्तव्य का सर्वोच्च उदाहरण है राम वनवास
कथावाचक पंडित पुरुषोत्तम व्यास ‘मीमांसक’ ने राम वनवास के प्रसंग को भारतीय संस्कृति में त्याग और आदर्श का शिखर बताया। उन्होंने कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम ने पिता राजा दशरथ के वचनों और रघुकुल की मर्यादा को निभाने के लिए क्षण भर में राजपाट और सुख-वैभव का त्याग कर दिया।

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व्यास जी ने विस्तार से बताया कि कैसे दासी मंथरा के बहकावे में आकर महारानी कैकयी ने राजा दशरथ से अपने दो वरदान मांगे—भरत का राज्याभिषेक और श्री राम के लिए 14 वर्ष का कठिन वनवास। पिता की व्याकुलता को देखते हुए श्री राम ने बिना किसी संकोच के राजसी वस्त्र त्याग कर वनवासी वेश धारण किया। उनके साथ माता सीता ने पतिव्रता धर्म और लक्ष्मण ने भ्रातृ-प्रेम का अनूठा उदाहरण पेश करते हुए स्वेच्छा से वन गमन किया।

केवट प्रसंग- भक्ति के आगे नतमस्तक हुए भगवान
कथा के दौरान भगवान श्री राम और केवट के बीच हुए संवाद को सचेतन झांकियों के माध्यम से जीवंत किया गया। पंडित जी ने “कभी-कभी भगवान को भक्तों से काम पड़े, जाना था गंगा पार प्रभु केवट की नाव चढ़े” जैसे भजनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को भक्ति के रस में डुबो दिया।

उन्होंने कहा कि परमात्मा पर अटूट विश्वास रखने वाले भक्तों को भगवान स्वयं भवसागर से पार लगाते हैं। भक्ति मार्ग में छुआछूत या ऊंच-नीच का कोई स्थान नहीं है। भगवान केवल प्रेम और निष्ठा के भूखे हैं, जैसा कि उन्होंने केवट और शबरी के प्रसंगों में सिद्ध किया।

पारिवारिक एकता और संस्कारों की सीख
व्यास जी ने कथा को लौकिक प्रसंगों से जोड़ते हुए सामाजिक सीख दी। उन्होंने कहा:

  • संतान को सदैव अपने माता-पिता की आज्ञा और वचनों का पालन करना चाहिए।
  • भाइयों के बीच प्रेम और एकता ही परिवार की असली शक्ति है।
  • समाज और घर में ‘मंथरा’ जैसे स्वभाव वाले व्यक्तियों से सावधान रहना चाहिए, जो कलह के बीज बोते हैं।
  • घर-परिवार का संचालन सुख, शांति और सद्भाव के साथ करना ही सच्ची रामायण है।
  • कार्यक्रम के अंत में सामूहिक संकीर्तन “रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीताराम” के साथ समूचा पांडाल राममय हो गया।

 

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