पंच परमेष्ठी ने प्राणी मात्र की रक्षा का संदेश दिया- गणिवर्य मेहुल प्रभ सागर

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बीकानेर, 27 अक्तूबर । गणिवर्य मेहुल प्रभ सागर म.सा. ने सोमवार (27 अक्टूबर) को रांगड़ी चौक स्थित सुगनजी महाराज के उपासरे में प्रवचन के दौरान शांति व सर्व कल्याण मंत्र, “ऊं सर्वे भवन्तु सुखिनः…” सुनाते हुए कहा कि भारतीय धर्म व संस्कृति सभी प्राणियों के सुख की कामना करती है। उन्होंने कहा कि जैन धर्म के सभी तीर्थंकरों, सिद्धों, आचार्य, उपाध्याय व साधुओं की पंच परमेष्ठी ने प्राणी मात्र की रक्षा, अहिंसा, करुणा व क्षमा का संदेश दिया है।

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जीवन में कषायों से बचें और सद्गुणों को प्रतिष्ठित करें

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गणिवर्य ने बताया कि यह मंगल कामना है कि संसार के सभी प्राणी सुखी हों, रोग आदि कष्टों से मुक्त रहें, सभी का जीवन मंगलमय हो और कोई भी प्राणी दुखी न रहे। उन्होंने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए काम, क्रोध, लोभ व मोह आदि कषायों से बचने और जीवन में अहिंसा, करुणा, क्षमा, सरलता व संतोष जैसे गुणों को अंतर्मन में प्रतिष्ठित करने का संदेश दिया। उन्होंने राग-द्वेष से बचते हुए सबके प्रति निस्वार्थ भावना और कामना रखने पर बल दिया।

दान का महत्व: सुपात्र को दान से धर्म का मर्म समझ आता है

गणिवर्य ने दान के महत्व की विवेचना करते हुए कहा कि तीर्थंकर परमात्मा को दिया गया दान स्वर्णदान के समान है, जबकि सिद्ध, उपाध्याय, आचार्य व साधुओं को दिया गया दान रजत दान या सुपात्र दान कहलाता है। उन्होंने कहा कि दान देते समय सुपात्र-कुपात्र की चेतना रखनी चाहिए और निष्काम भाव रखना चाहिए। सुपात्र को दान देने से धर्म का मर्म समझ आता है तथा पुण्य की प्राप्ति होती है।

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