राजुवास वीसी की नियुक्ति पर कानूनी तलवार, राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्यपाल को थमाया नोटिस; 10 साल के अनुभव पर उठे सवाल

राज्यपाल हरिभाऊ बागडे के साथ यूनिवर्सिटी के वीसी डॉ. सुमंत व्यास।
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जयपुर, 27 फरवरी। राजस्थान पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (राजुवास), बीकानेर के कुलपति (वीसी) की नियुक्ति अब कानूनी विवादों के घेरे में आ गई है। राजस्थान हाईकोर्ट ने कुलाधिपति एवं राज्यपाल हरिभाऊ बागडे को उनके सचिव के माध्यम से नोटिस जारी कर तीन सप्ताह में जवाब तलब किया है। जस्टिस आनंद शर्मा की अदालत ने यह आदेश डॉ. आर.के. बाघेरवाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें वर्तमान कुलपति डॉ. सुमंत व्यास की नियुक्ति को नियमों के विरुद्ध बताते हुए उसे रद्द करने की मांग की गई है।

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चुनौती के दो मुख्य आधार: सर्च कमेटी और अनुभव
अदालत में याचिकाकर्ता के अधिवक्ता दिनेश यादव ने तर्क दिया कि कुलपति चयन की पूरी प्रक्रिया में यूजीसी (UGC) के दिशा-निर्देशों की अनदेखी की गई है। याचिका में मुख्य रूप से दो बिंदुओं पर आपत्ति जताई गई है।

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सर्च कमेटी की निष्पक्षता: नियमों के अनुसार, वीसी चयन के लिए गठित सर्च कमेटी का अध्यक्ष उस विश्वविद्यालय से संबंधित नहीं होना चाहिए। आरोप है कि इस मामले में प्रोफेसर त्रिभुवन शर्मा को चेयरमैन बनाया गया, जो इसी विश्वविद्यालय के ‘एनिमल न्यूट्रिशन’ विभाग के विभागाध्यक्ष रह चुके हैं।

टीचिंग अनुभव का अभाव: यूजीसी के कड़े नियमों के तहत कुलपति पद के लिए कम से कम 10 वर्ष का शैक्षणिक (टीचिंग) अनुभव अनिवार्य है। याचिका में दावा किया गया है कि डॉ. सुमंत व्यास के पास इस निर्धारित अवधि का शिक्षण अनुभव नहीं है।

वैज्ञानिक से कुलपति तक का सफर अब जांच के घेरे में
डॉ. सुमंत व्यास का करियर मुख्य रूप से अनुसंधान (Research) से जुड़ा रहा है। उन्होंने राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र (NRCC) में एक वरिष्ठ वैज्ञानिक के रूप में लंबे समय तक सेवाएं दी हैं और इसके बाद वे जोधपुर स्थित ‘काजरी’ (CAZRI) के निदेशक भी रहे।

विवाद की जड़: 4 सितंबर 2025 को राज्यपाल द्वारा उनकी नियुक्ति के बाद से ही शैक्षणिक जगत में उनके ‘टीचिंग एक्सपीरियंस’ को लेकर चर्चाएं गर्म थीं।

अदालती कार्रवाई: हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्यपाल के साथ-साथ विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार, राज्य सरकार और स्वयं कुलपति डॉ. सुमंत व्यास से भी विस्तृत जवाब मांगा है।

विश्वविद्यालय के भविष्य पर असर
राजुवास जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में सर्वोच्च पद पर नियुक्ति को लेकर उठे इस विवाद ने प्रशासनिक कामकाज पर भी असर डालना शुरू कर दिया है। यदि तीन सप्ताह बाद होने वाली अगली सुनवाई में संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है, तो सर्च कमेटी के गठन से लेकर नियुक्ति तक की पूरी प्रक्रिया को नए सिरे से करने का दबाव बढ़ सकता है।

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