इंद्रिय संयम से ही संभव है कर्म बंधन से मुक्ति’— मुक्तांजना श्री जी
इंद्रिय संयम से ही संभव है कर्म बंधन से मुक्ति'— मुक्तांजना श्री जी


- अमिचंद की अमी दृष्टि’ के कथानक में आया नया मोड़, श्रद्धालुओं को भाया आध्यात्मिक व पारिवारिक संदेश
बीकानेर, 8 अगस्त । शहर के सुगन जी महाराज के उपासरे में आयोजित चातुर्मास धर्मसभा में परम पूज्य मुक्तांजना श्री जी महाराज साहब ने श्रद्धालुओं को इंद्रिय संयम और आत्म-नियंत्रण का गूढ़ महत्व समझाया। इस दौरान चातुर्मास के अंतर्गत चल रहे ‘अमिचंद की अमी दृष्टि’ के कथानक में आए नए भावनात्मक मोड़ ने भी श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित किया।


इंद्रियों पर नियंत्रण ही वास्तविक संयम
धर्मसभा में पांच इंद्रियों के विषय पर चल रहे विवेचन को आगे बढ़ाते हुए मुक्तांजना श्री जी महाराज साहब ने कहा कि मनुष्य अपनी आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा—इन पांचों इंद्रियों के वशीभूत होकर अनजाने में कर्मों का बंधन करता चला जाता है। इंद्रियों के विषयों में आसक्ति मनुष्य को उसके आत्मस्वरूप से दूर ले जाती है।


उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल बाहरी रूप से विषयों का त्याग कर देना ही संयम नहीं है, बल्कि विषय सामने होने पर भी मन को आसक्त न होने देना ही वास्तविक संयम है। यदि मनुष्य विवेक और जागरूकता के साथ इंद्रियों को वश में रखे, तो इंद्रियां साधना का माध्यम बन जाती हैं।
‘अमिचंद की अमी दृष्टि’ में उपजा पारिवारिक तनाव
चातुर्मास के दौरान चल रहे ‘अमिचंद की अमी दृष्टि’ के कथानक में आज एक नया मोड़ देखने को मिला। कथानक के अनुसार, जब विनु ने अमिचंद के सामने अलग घर और दुकान करने की इच्छा जताई, तो अमिचंद को गहरा आघात लगा और वह बेहोश हो गया। होश में आने पर अमिचंद ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा—”यह बात मैं तुम्हारी भाभी को कैसे बताऊंगा?” इस प्रसंग ने पारिवारिक रिश्तों, मोह-ममता और परिस्थितियों के बीच उपजने वाले तनाव को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया।
धर्मसभा में जहां श्रद्धालुओं को इंद्रिय संयम और कर्म-मुक्ति का आध्यात्मिक मार्गदर्शन मिला, वहीं कथानक के जरिए पारिवारिक जीवन और व्यावहारिक परिस्थितियों पर चिंतन का अवसर भी प्राप्त हुआ।


