पश्चिम बंगाल सियासी घमासान में संगठन पर ममता की मजबूत पकड़ बनी ढाल, बागियों के लिए राह हुई बेहद कठिन
ममता बनर्जी



कोलकाता, 16 जून। पश्चिम बंगाल के सियासी समर में मचे घमासान के बीच अब यह पूरी तरह साफ होने लगा है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की संगठनात्मक पकड़ को हिला पाना बागी गुट के लिए नामुमकिन साबित हो रहा है। लोकसभा में दो-तिहाई से ज्यादा सांसदों को तोड़कर ‘राष्ट्रवादी सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में विलय करने वाले बागी खेमे की रणनीति अब संगठन के मोर्चे पर आकर पूरी तरह कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि केवल सांसदों की संख्या के बल पर ममता बनर्जी से ‘असली टीएमसी’ छीनना बागी नेताओं के लिए दूर की कौड़ी साबित होगा।


सांगठनिक ढांचा बना ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ढाल
चुनाव आयोग और कानूनी नियमों के मुताबिक, किसी भी राजनीतिक दल के विभाजन या ‘असली पार्टी’ के निर्धारण में सिर्फ विधायी दल (सांसद-विधायक) का बहुमत ही काफी नहीं होता। इसके लिए पार्टी के सांगठनिक ढांचे, जैसे—राष्ट्रीय कार्यकारिणी (National Executive), राज्य इकाइयों, जिला अध्यक्षों और जमीनी पदाधिकारियों का समर्थन मिलना सबसे जरूरी है।


ममता का एकछत्र राज: टीएमसी के इस सांगठनिक मोर्चे पर आज भी पूरी तरह से ममता बनर्जी का ही दबदबा कायम है।
बागियों की लाचारी: बागी खेमे के पास सांसदों का आंकड़ा तो है, लेकिन संगठन का एक भी बड़ा पदाधिकारी या जिला अध्यक्ष उनके साथ नहीं गया है। यही वजह है कि बागी गुट चाहकर भी चुनाव आयोग के सामने ‘असली टीएमसी’ और उसके मूल चुनाव चिह्न (दो फूल) पर मजबूत कानूनी दावा पेश नहीं कर पा रहा है।
महाराष्ट्र जैसा दांव बंगाल में हुआ फेल, इसलिए चुना विलय का रास्ता
शुरुआत में राजनीतिक गलियारों में यह कयास लगाए जा रहे थे कि बंगाल में भी महाराष्ट्र की तर्ज पर एकनाथ शिंदे या अजीत पवार जैसा खेल दोहराया जाएगा, जहां बागियों ने मूल पार्टी पर ही कब्जा कर लिया था। लेकिन ममता बनर्जी के आक्रामक रुख और संगठन पर मजबूत नियंत्रण को भांपते हुए बागी सांसदों को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर होना पड़ा। अयोग्यता (Disqualification) की कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए उन्होंने ‘असली टीएमसी’ पर दावा ठोकने के बजाय चुपचाप खुद को एक अन्य पंजीकृत दल (NCPI) में विलय करना ज्यादा सुरक्षित समझा।
सांसद और विधायकों की अलग-अलग राह से बढ़ा असमंजस
ममता बनर्जी के लिए इस पूरे राजनीतिक संकट में सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि बगावत की यह आग फिलहाल केवल दिल्ली (संसदीय स्तर) तक ही सीमित है। पश्चिम बंगाल विधानसभा में बागी विधायकों का रुख अभी भी साफ नहीं है और वे सांसदों की तरह खुलकर NCPI के साथ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। सांसदों और विधायकों की इस अलग-अलग रणनीति ने बागी खेमे के भीतर ही भारी असमंजस पैदा कर दिया है। जानकारों का कहना है कि जब तक बंगाल के विधायक भी इस बगावत में शामिल नहीं होते, तब तक ममता बनर्जी का पलड़ा फिलहाल बेहद भारी दिखाई दे रहा है कोई खतरा नहीं है।
मानसून सत्र से पहले साझा रणनीति की तैयारी: इस बीच, बागी गुट के मुखिया सुदीप बंदोपाध्याय ने संकेत दिए हैं कि संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले दोनों गुटों (ममता खेमा और बागी खेमा) के बीच किसी तरह की साझा रणनीति या समझौते की बातचीत हो सकती है। हालांकि, कानूनी और राजनीतिक दोनों ही मोर्चों पर ममता बनर्जी का पलड़ा फिलहाल बेहद भारी दिखाई दे रहा है। अब आने वाले हफ्तों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बागी सांसद एनडीए सरकार में शामिल होकर अपनी अलग पहचान चमकाते हैं या फिर ‘असली टीएमसी’ पर कब्जे की कोई नई कानूनी लड़ाई शुरू करते हैं।


